The Vision of Śiva· 5.9 / 110

The Vision of Śiva5.9

5.9
दुःखादिना विशेषश्चेत् तत्राप्यशिवता नच । दुःखेऽपि प्रविकासेन दुःखार्थे धृतिसंगमात् ॥९॥
duḥkhādinā viśeṣaścet tatrāpyaśivatā naca | duḥkhe'pi pravikāsena duḥkhārthe dhṛtisaṃgamāt
— दुःख आदि से ; — विशेष (भेद) ; — यदि ; — वहाँ भी ; — अशिवता ; — नहीं ; — दुःख में भी ; — (चित् के) प्रविकास के द्वारा ; — दुःख-विषय में ; — धृति (दृढ़ता) के संगम के कारण

यदि (कहो कि) दुःख आदि से विशेष (भेद आता है) — तो वहाँ भी अशिवता नहीं; क्योंकि दुःख में भी, (चित् के) प्रविकास के द्वारा, दुःख-विषय में धृति (दृढ़ता) के संगम के कारण (शिवत्व बना रहता है)।