स्वल्पतेजसि दार्ढ्याद्वा सर्वत्र शिवतुल्यता ।
भवेदिच्छादिविषये सर्वत्र प्रविसारिणी ॥८॥
svalpatejasi dārḍhyādvā sarvatra śivatulyatā |
bhavedicchādiviṣaye sarvatra pravisāriṇī
अल्प तेज में भी, अथवा (अग्नि की) दृढ़ता के कारण, सर्वत्र शिव से तुल्यता रहती है; (ऐसी तुल्यता) इच्छा आदि के विषय में सर्वत्र प्रसरित होने वाली होगी।