The Vision of Śiva· 5.10 / 110

The Vision of Śiva5.10

5.10
दृश्यते बन्धनं तेषु धृतिः कीटादिके तथा । निर्वृत्या यत्र योगोऽस्ति तत्रैव शिवता स्फुटम् ॥१०॥
dṛśyate bandhanaṃ teṣu dhṛtiḥ kīṭādike tathā | nirvṛtyā yatra yogo'sti tatraiva śivatā sphuṭam
— देखी जाती है ; — (बन्धन-) आसक्ति ; — उनमें ; — धृति (दृढ़ता) ; — कीट आदि में ; — उसी प्रकार ; — निर्वृति (आनन्द) के साथ ; — जहाँ ; — योग ; — है ; — वहीं ; — शिवता ; — स्पष्टतः

(क्योंकि) उनमें (बन्धन-) आसक्ति देखी जाती है, और उसी प्रकार कीट आदि में भी धृति (दृढ़ता); और जहाँ निर्वृति (आनन्द) के साथ योग है, वहीं स्पष्टतः शिवता (है)।