दृश्यते बन्धनं तेषु धृतिः कीटादिके तथा ।
निर्वृत्या यत्र योगोऽस्ति तत्रैव शिवता स्फुटम् ॥१०॥
dṛśyate bandhanaṃ teṣu dhṛtiḥ kīṭādike tathā |
nirvṛtyā yatra yogo'sti tatraiva śivatā sphuṭam
(क्योंकि) उनमें (बन्धन-) आसक्ति देखी जाती है, और उसी प्रकार कीट आदि में भी धृति (दृढ़ता); और जहाँ निर्वृति (आनन्द) के साथ योग है, वहीं स्पष्टतः शिवता (है)।