The Vision of Śiva· 5.87 / 110

The Vision of Śiva5.87

5.87
ये तत्र पृष्ठतो वृत्तास्ते प्रत्येकममूर्तकाः । अमूर्तत्वेन भावानां दर्शनं नान्यथा भवेत् ॥८७॥
ye tatra pṛṣṭhato vṛttāste pratyekamamūrtakāḥ | amūrtatvena bhāvānāṃ darśanaṃ nānyathā bhavet
— जो ; — वहाँ ; — पीछे की ओर ; — स्थित ; — वे ; — प्रत्येक अकेले ; — अमूर्त ; — अमूर्तता के द्वारा ; — भावों का ; — दर्शन ; — अन्यथा नहीं हो सके

जो (परमाणु) वहाँ पीछे की ओर स्थित हैं, वे प्रत्येक अकेले अमूर्त हैं (फिर भी ज्ञान में आते हैं); (अतः) भावों का दर्शन अमूर्तता के द्वारा (उनके मौलिक चित्-स्वरूप से) ही होता है, अन्यथा नहीं।