दृश्यत्वं तेषु संघातात् किं तेषां रूपताक्षतिः ।
स्वरूपमिश्रीभावो वा नैवं चेत्तर्ह्यमूर्तता ॥८६॥
dṛśyatvaṃ teṣu saṃghātāt kiṃ teṣāṃ rūpatākṣatiḥ |
svarūpamiśrībhāvo vā naivaṃ cettarhyamūrtatā
(यदि) उनमें दृश्यता संघात (समूह) से (आती है) — तो क्या वह उनके (वैयक्तिक अदृश्य) रूप की क्षति है, अथवा स्वरूपों का मिश्री-भाव (मिलकर नया दृश्य स्वरूप)? और यदि ऐसा (कोई भी) नहीं, तो (उनकी) अमूर्तता (अक्षुण्ण रहती है, और समूह भी अमूर्त ही)।