The Vision of Śiva· 5.86 / 110

The Vision of Śiva5.86

5.86
दृश्यत्वं तेषु संघातात् किं तेषां रूपताक्षतिः । स्वरूपमिश्रीभावो वा नैवं चेत्तर्ह्यमूर्तता ॥८६॥
dṛśyatvaṃ teṣu saṃghātāt kiṃ teṣāṃ rūpatākṣatiḥ | svarūpamiśrībhāvo vā naivaṃ cettarhyamūrtatā
— दृश्यता ; — उनमें ; — संघात (समूह) से ; — क्या ; — उनके ; — रूप की क्षति ; — अथवा स्वरूपों का मिश्री-भाव ; — ऐसा (कोई भी) न होने पर ; — तब ; — अमूर्तता (अक्षुण्ण)

(यदि) उनमें दृश्यता संघात (समूह) से (आती है) — तो क्या वह उनके (वैयक्तिक अदृश्य) रूप की क्षति है, अथवा स्वरूपों का मिश्री-भाव (मिलकर नया दृश्य स्वरूप)? और यदि ऐसा (कोई भी) नहीं, तो (उनकी) अमूर्तता (अक्षुण्ण रहती है, और समूह भी अमूर्त ही)।