सूक्ष्मत्वात्तर्ह्यदृश्यत्वमस्पृश्यत्वममूर्तता ।
तैरदृश्यैर्यदारब्धं तत्तथैवाथ संहतेः ॥८५॥
sūkṣmatvāttarhyadṛśyatvamaspṛśyatvamamūrtatā |
tairadṛśyairyadārabdhaṃ tattathaivātha saṃhateḥ
तब (तुम स्वीकार करते हो कि) सूक्ष्मता के कारण अदृश्यता, अस्पृश्यता — (एक शब्द में) अमूर्तता (आ जाती है)। (किन्तु) जो उन अदृश्य (परमाणुओं) से आरब्ध (रचित) है, वह भी वैसा ही (अदृश्य होगा) — अथवा (दृश्यता) संहति (समूह) से (आती है, जो नया प्रश्न उठाती है)।