The Vision of Śiva· 5.84 / 110

The Vision of Śiva5.84

5.84
ज्ञेया अवयवेनैते यावद्यावददर्शनाः । अणूनामथ मूर्तत्वादेवं चेत् किं न दर्शनम् ॥८४॥
jñeyā avayavenaite yāvadyāvadadarśanāḥ | aṇūnāmatha mūrtatvādevaṃ cet kiṃ na darśanam
— जानने योग्य ; — अवयव से ; — ये ; — जितने-जितने ; — अदर्शन (अदृश्य) ; — परमाणुओं के ; — अब ; — मूर्त होने के कारण ; — ऐसा होने पर ; — दर्शन क्यों नहीं

ये (भाव) अपने अवयव से जानने योग्य हैं, जितने-जितने (वे) अदर्शन (अदृश्य) हों। अब यदि (कहो कि) परमाणु (मूर्त हैं) — तो (उनके) मूर्त होने के कारण, इस प्रकार (मानने पर), उनका दर्शन क्यों नहीं (होता — उत्तर तो उनकी सूक्ष्मता ही है)?