ज्ञेया अवयवेनैते यावद्यावददर्शनाः ।
अणूनामथ मूर्तत्वादेवं चेत् किं न दर्शनम् ॥८४॥
jñeyā avayavenaite yāvadyāvadadarśanāḥ |
aṇūnāmatha mūrtatvādevaṃ cet kiṃ na darśanam
ये (भाव) अपने अवयव से जानने योग्य हैं, जितने-जितने (वे) अदर्शन (अदृश्य) हों। अब यदि (कहो कि) परमाणु (मूर्त हैं) — तो (उनके) मूर्त होने के कारण, इस प्रकार (मानने पर), उनका दर्शन क्यों नहीं (होता — उत्तर तो उनकी सूक्ष्मता ही है)?