The Vision of Śiva· 5.83 / 110

The Vision of Śiva5.83

5.83
तद्देशत्वं पुनः कस्मादिति चेत्तत्तथाग्रतः । भावा मूर्ताः सर्व एव सूक्ष्मसूक्ष्मतरादिना ॥८३॥
taddeśatvaṃ punaḥ kasmāditi cettattathāgrataḥ | bhāvā mūrtāḥ sarva eva sūkṣmasūkṣmatarādinā
— उसका उस देश में होना ; — पुनः ; — किससे ; — यदि (पूछा जाए) ; — वह ; — वैसा ; — आगे (समझाया जाएगा) ; — भाव ; — मूर्त ; — सब ही ; — सूक्ष्म, सूक्ष्मतर आदि से

और यदि पुनः पूछा जाए कि 'उसका उस देश में होना किससे (होता है)?' — वह आगे (समझाया जाएगा)। (अभी इतना:) सब भाव मूर्त हैं, किन्तु सूक्ष्म, सूक्ष्मतर आदि (क्रम) से।