The Vision of Śiva· 5.82 / 110

The Vision of Śiva5.82

5.82
तत्र चेत् सुप्रसिद्धत्वे तथा तत्र प्रसिद्धितः । तुल्यकालं द्वयोर्द्वैधं नैवं यत्तदलक्ष्यता ॥८२॥
tatra cet suprasiddhatve tathā tatra prasiddhitaḥ | tulyakālaṃ dvayordvaidhaṃ naivaṃ yattadalakṣyatā
— वहाँ ; — यदि ; — सुप्रसिद्ध होने पर ; — उसी प्रकार ; — वहाँ ; — प्रसिद्ध होने से ; — एक साथ ; — दोनों का ; — द्वैध (युगपत् रहना) ; — ऐसा नहीं ; — क्योंकि ; — अलक्ष्यता (अदृश्यता)

यदि (कहो कि) वहाँ (दीप में वह चेतना-व्यापार) सुप्रसिद्ध है, तो उसी प्रकार वहाँ (नौका में भी) (उसके) प्रसिद्ध होने से (वही मानो)। (और तुम आपत्ति करो कि) दोनों (चेतना और उपकरण) का एक साथ द्वैध (युगपत् रहना अपेक्षित होगा) — ऐसा नहीं, क्योंकि (एक की) अलक्ष्यता (अदृश्यता है, अभाव नहीं)।