सर्वत्र देवतात्मत्वाज्जडेष्वप्युपवर्णिता ।
पोतादेश्चेदुपायेन दृष्टे दीपाद्युपायता ॥८१॥
sarvatra devatātmatvājjaḍeṣvapyupavarṇitā |
potādeścedupāyena dṛṣṭe dīpādyupāyatā
सर्वत्र देवता-आत्मक होने के कारण, जड़ वस्तुओं में भी (चेतना) वर्णित की गई है; और यदि (कहो कि) नौका आदि (किसी बाह्य) उपाय से (चलती है) — तो (देखे गए दृष्टान्त में भी वही है,) जैसे दीप आदि की उपायता (जो फिर भी चेतना से व्याप्त है)।