The Vision of Śiva· 5.81 / 110

The Vision of Śiva5.81

5.81
सर्वत्र देवतात्मत्वाज्जडेष्वप्युपवर्णिता । पोतादेश्चेदुपायेन दृष्टे दीपाद्युपायता ॥८१॥
sarvatra devatātmatvājjaḍeṣvapyupavarṇitā | potādeścedupāyena dṛṣṭe dīpādyupāyatā
— सर्वत्र ; — देवता-आत्मक होने के कारण ; — जड़ वस्तुओं में भी ; — (चेतना) वर्णित ; — नौका आदि के ; — यदि (कहो) ; — उपाय से ; — देखे गए (दृष्टान्त) में ; — दीप आदि की उपायता

सर्वत्र देवता-आत्मक होने के कारण, जड़ वस्तुओं में भी (चेतना) वर्णित की गई है; और यदि (कहो कि) नौका आदि (किसी बाह्य) उपाय से (चलती है) — तो (देखे गए दृष्टान्त में भी वही है,) जैसे दीप आदि की उपायता (जो फिर भी चेतना से व्याप्त है)।