भूकम्पनाच्च शेषादिचलनाच्चेन्न सर्वतः ।
गमागमेन वायवादेः कान्या भवति चेतना ॥८०॥
bhūkampanācca śeṣādicalanāccenna sarvataḥ |
gamāgamena vāyavādeḥ kānyā bhavati cetanā
और (यदि पूछो कि) भूमि के कम्पन से, शेष आदि के चलन से (यह होता है) — तो (उत्तर:) सबसे (समान रूप से) नहीं; (अपितु) वायु आदि के आने-जाने में (उनकी अपनी अन्तर्निहित) चेतना के अतिरिक्त कौन-सी अन्य (व्याख्या हो सकती है)?