The Vision of Śiva· 5.88 / 110

The Vision of Śiva5.88

5.88
ज्ञानस्वरूपग्रहाणां तद्ग्रहात्तद्ग्रहः किल । अतत्स्वरूपरूपत्वे नान्यस्यान्यग्रहाद्ग्रहः ॥८८॥
jñānasvarūpagrahāṇāṃ tadgrahāttadgrahaḥ kila | atatsvarūparūpatve nānyasyānyagrahādgrahaḥ
— ज्ञान-स्वरूप (विषयों) के ग्राहक (ज्ञानों) के लिए ; — उस (ज्ञान) के ग्रहण से ; — उस (विषय) का ग्रहण ; — निश्चय ही ; — अतत्-स्वरूप (भिन्न) होने पर ; — नहीं ; — अन्य (वस्तु) का ; — अन्य (भिन्न) के ग्रहण से ; — ग्रहण

क्योंकि ज्ञान-स्वरूप (जिनका स्वरूप स्वयं ज्ञान है, ऐसे विषयों) के ग्राहक (ज्ञानों) के लिए, उस (ज्ञान) के ग्रहण से उस (विषय) का ग्रहण होता है; (किन्तु यदि विषय) अतत्-स्वरूप (उस चित्-स्वरूप से भिन्न) हो, तो एक (वस्तु) का दूसरे (सर्वथा भिन्न) के ग्रहण से ग्रहण नहीं (हो सकता)।