ज्ञानस्वरूपग्रहाणां तद्ग्रहात्तद्ग्रहः किल ।
अतत्स्वरूपरूपत्वे नान्यस्यान्यग्रहाद्ग्रहः ॥८८॥
jñānasvarūpagrahāṇāṃ tadgrahāttadgrahaḥ kila |
atatsvarūparūpatve nānyasyānyagrahādgrahaḥ
क्योंकि ज्ञान-स्वरूप (जिनका स्वरूप स्वयं ज्ञान है, ऐसे विषयों) के ग्राहक (ज्ञानों) के लिए, उस (ज्ञान) के ग्रहण से उस (विषय) का ग्रहण होता है; (किन्तु यदि विषय) अतत्-स्वरूप (उस चित्-स्वरूप से भिन्न) हो, तो एक (वस्तु) का दूसरे (सर्वथा भिन्न) के ग्रहण से ग्रहण नहीं (हो सकता)।