न सर्वेषां विशेषाणां प्रत्यक्षेऽपि भवेद् ग्रहः ।
विशेषपूर्वताध्यक्षेऽविशेषोऽस्त्यनुमानतः ॥७०॥
na sarveṣāṃ viśeṣāṇāṃ pratyakṣe'pi bhaved grahaḥ |
viśeṣapūrvatādhyakṣe'viśeṣo'styanumānataḥ
प्रत्यक्ष में भी समस्त विशेषों का ग्रहण नहीं होता; (और यद्यपि) प्रत्यक्ष में विशेष की पूर्वता (प्रधानता) है, (फिर भी एक अवशिष्ट) अविशेष (सामान्यता) रहती है — (जो) अनुमान से (पूरी की जाती है; अतः कोई भी प्रमाण स्व-पर्याप्त नहीं)।