न भांडे शक्यते धूमः प्रवेष्टुं वह्निवर्जिते ।
तस्माद्वर्णनिकैवेयं परस्यान्ध्याय कल्पिता ॥६८॥
na bhāṃḍe śakyate dhūmaḥ praveṣṭuṃ vahnivarjite |
tasmādvarṇanikaiveyaṃ parasyāndhyāya kalpitā
(जैसे) अग्नि-रहित भाण्ड (पात्र) में धूम प्रवेश नहीं कर सकता (फिर भी प्रवेश करता-सा दीखे), इसलिए यह (समस्त अनुमान-मत) केवल वर्णनिका (शाब्दिक रचना) है, जो विरोधी के (और अधिक) अन्धत्व के लिए रची गई है।