The Vision of Śiva· 5.68 / 110

The Vision of Śiva5.68

5.68
न भांडे शक्यते धूमः प्रवेष्टुं वह्निवर्जिते । तस्माद्वर्णनिकैवेयं परस्यान्ध्याय कल्पिता ॥६८॥
na bhāṃḍe śakyate dhūmaḥ praveṣṭuṃ vahnivarjite | tasmādvarṇanikaiveyaṃ parasyāndhyāya kalpitā
— नहीं ; — भाण्ड (पात्र) में ; — सकता ; — धूम ; — प्रवेश करना ; — अग्नि-रहित ; — इसलिए ; — वर्णनिका (शाब्दिक रचना) ही ; — यह ; — विरोधी के ; — अन्धत्व के लिए ; — रची गई

(जैसे) अग्नि-रहित भाण्ड (पात्र) में धूम प्रवेश नहीं कर सकता (फिर भी प्रवेश करता-सा दीखे), इसलिए यह (समस्त अनुमान-मत) केवल वर्णनिका (शाब्दिक रचना) है, जो विरोधी के (और अधिक) अन्धत्व के लिए रची गई है।