The Vision of Śiva· 5.65 / 110

The Vision of Śiva5.65

5.65
शब्दैरर्थाः प्रतीयन्ते सर्वत्रैवं क्व निश्चयः । स्फोटादर्थप्रतीतिश्चेद् व्यज्यते तैः क्व निर्णयः ॥६५॥
śabdairarthāḥ pratīyante sarvatraivaṃ kva niścayaḥ | sphoṭādarthapratītiśced vyajyate taiḥ kva nirṇayaḥ
— शब्दों से ; — अर्थ ; — प्रतीत होते हैं ; — सर्वत्र ; — इस प्रकार ; — निश्चय कहाँ ; — स्फोट से ; — अर्थ-प्रतीति ; — यदि ; — व्यंजित होती है ; — उन (ध्वनियों) से ; — निर्णय कहाँ

(यदि) इस प्रकार शब्दों से ही अर्थ सर्वत्र प्रतीत होते हैं — तो (वस्तु-विषयक स्वतन्त्र) निश्चय कहाँ? और यदि (कहो कि) अर्थ-प्रतीति स्फोट से (होती है), जो उन (ध्वनियों) से व्यंजित होता है — तो निर्णय कहाँ (संवित् के बिना)?