शब्दैरर्थाः प्रतीयन्ते सर्वत्रैवं क्व निश्चयः ।
स्फोटादर्थप्रतीतिश्चेद् व्यज्यते तैः क्व निर्णयः ॥६५॥
śabdairarthāḥ pratīyante sarvatraivaṃ kva niścayaḥ |
sphoṭādarthapratītiśced vyajyate taiḥ kva nirṇayaḥ
(यदि) इस प्रकार शब्दों से ही अर्थ सर्वत्र प्रतीत होते हैं — तो (वस्तु-विषयक स्वतन्त्र) निश्चय कहाँ? और यदि (कहो कि) अर्थ-प्रतीति स्फोट से (होती है), जो उन (ध्वनियों) से व्यंजित होता है — तो निर्णय कहाँ (संवित् के बिना)?