तस्यापि सर्वदेश्यत्वान्निश्चयः केन लभ्यते ।
भोजनादेरचेष्टत्वे व्यवहारविलोपिता ॥६६॥
tasyāpi sarvadeśyatvānniścayaḥ kena labhyate |
bhojanāderaceṣṭatve vyavahāravilopitā
उस (स्फोट) का भी सर्वत्र निर्देश्य (होने) के कारण निश्चय किससे प्राप्त हो? और (यदि वास्तविक विषयों पर आधारित) भोजन आदि की (सार्थक) चेष्टा न हो, तो (समस्त) व्यवहार का विलोप (हो जाएगा)।