The Vision of Śiva· 5.64 / 110

The Vision of Śiva5.64

5.64
न चापि स्थिरभावानां क्वाप्यस्ति व्यभिचारिता । सूर्यः प्रकाशकः क्वापि काले देशेऽन्यथा भवेत् ॥६४॥
na cāpi sthirabhāvānāṃ kvāpyasti vyabhicāritā | sūryaḥ prakāśakaḥ kvāpi kāle deśe'nyathā bhavet
— और न ही ; — स्थिर भावों की ; — कहीं ; — है ; — व्यभिचारिता (अपवाद) ; — सूर्य ; — प्रकाशक ; — किसी भी ; — काल या देश में ; — अन्यथा होगा

और न ही स्थिर भावों की कहीं व्यभिचारिता (अपवाद) है: क्या सूर्य, जो प्रकाशक है, कभी किसी काल या देश में अन्यथा होगा? (नित्य स्वभाव कोई अपवाद नहीं रखते, जो क्षणिक मार्क का अनुमान नहीं दे सकता।)