The Vision of Śiva· 5.60 / 110

The Vision of Śiva5.60

5.60
तस्मात्तद्व्यपदेशे न वह्निः स्वं विनिवेदयेत् । वीक्ष्यात्मना तथात्मानं विनीतवदवस्थितम् ॥६०॥
tasmāttadvyapadeśe na vahniḥ svaṃ vinivedayet | vīkṣyātmanā tathātmānaṃ vinītavadavasthitam
— इसलिए ; — उस (मार्क के) व्यपदेश में ; — नहीं ; — अग्नि ; — अपने को ; — निवेदित करे ; — देखकर ; — अपने आत्मा से ; — उसी प्रकार अपने आत्मा को ; — विनीत (सुसंयत) के समान ; — अवस्थित

इसलिए उस (मार्क के) व्यपदेश (निर्देश) में अग्नि अपने को निवेदित नहीं कर सकती; (वस्तुतः संवित् ही) अपने आत्मा से अपने आत्मा को देखकर, विनीत (सुसंयत) के समान (विषय को प्रकट करती हुई) अवस्थित रहती है (— विषय-ज्ञान स्वयं-प्रकाश संवित् ही है)।