तस्मात्तद्व्यपदेशे न वह्निः स्वं विनिवेदयेत् ।
वीक्ष्यात्मना तथात्मानं विनीतवदवस्थितम् ॥६०॥
tasmāttadvyapadeśe na vahniḥ svaṃ vinivedayet |
vīkṣyātmanā tathātmānaṃ vinītavadavasthitam
इसलिए उस (मार्क के) व्यपदेश (निर्देश) में अग्नि अपने को निवेदित नहीं कर सकती; (वस्तुतः संवित् ही) अपने आत्मा से अपने आत्मा को देखकर, विनीत (सुसंयत) के समान (विषय को प्रकट करती हुई) अवस्थित रहती है (— विषय-ज्ञान स्वयं-प्रकाश संवित् ही है)।