The Vision of Śiva· 5.59 / 110

The Vision of Śiva5.59

5.59
महान्तं धूममुत्पाद्य तत्कालं वारिणा हतः । तत्र केवलधूमास्था न वह्निप्राप्तिरस्ति ते ॥५९॥
mahāntaṃ dhūmamutpādya tatkālaṃ vāriṇā hataḥ | tatra kevaladhūmāsthā na vahniprāptirasti te
— महान् धूम ; — उत्पन्न करके ; — उसी क्षण ; — जल से ; — बुझा दी जाती ; — वहाँ ; — केवल धूम का टिकना ; — नहीं अग्नि की प्राप्ति ; — तुम्हें है

महान् धूम उत्पन्न करके, उसी क्षण (अग्नि) जल से बुझा दी जाती है; वहाँ केवल धूम का ही टिकना (रहता है), अग्नि की प्राप्ति तुम्हें नहीं (होती — अनुमान भ्रान्त कराता है)।