The Vision of Śiva· 5.58 / 110

The Vision of Śiva5.58

5.58
धूमादग्निप्रतीतिश्च न चायं नियमः स्थितः । कक्षभूर्जादिजो वह्निर्गुहाकारे ज्वलन् गृहे ॥५८॥
dhūmādagnipratītiśca na cāyaṃ niyamaḥ sthitaḥ | kakṣabhūrjādijo vahnirguhākāre jvalan gṛhe
— धूम से ; — अग्नि-प्रतीति ; — और नहीं ; — यह नियम ; — स्थित ; — घास, भोजपत्र आदि से उत्पन्न ; — अग्नि ; — गुफा-जैसे में ; — जलती हुई ; — घर में

और धूम से अग्नि-प्रतीति — यह नियम (भी) स्थित नहीं; (देखो) घास, भोजपत्र आदि से उत्पन्न अग्नि, गुफा-जैसे घर में जलती हुई (— और उसका परिणाम देखो)।