वह्नेस्तु तत्रापेक्ष्यत्वे जनकत्वं व्यवस्थितम् ।
यच्च यद्विषयं ज्ञानं जज्जन्यं तस्य दृष्टवत् ॥५७॥
vahnestu tatrāpekṣyatve janakatvaṃ vyavasthitam |
yacca yadviṣayaṃ jñānaṃ jajjanyaṃ tasya dṛṣṭavat
किन्तु अग्नि के, यदि वहाँ वही अपेक्ष्य (आश्रयणीय) हो, तो (उसी का) जनकत्व (ज्ञान-उत्पादकत्व) सिद्ध होता है; और जो ज्ञान जिस विषय वाला है, वह उसी से जन्य है — दर्शन (प्रत्यक्ष) के समान (अतः विषय ही, न कि मार्क, ज्ञान को उत्पन्न करता है)।