स्वार्थानुमानं नैवं चेन्न शब्दैरन्तरे स्थितम् ।
अग्निरेषोऽत्र धूमो वा दर्शयेन्न ह्यदर्शने ॥५५॥
svārthānumānaṃ naivaṃ cenna śabdairantare sthitam |
agnireṣo'tra dhūmo vā darśayenna hyadarśane
यदि (आक्षेप करो कि) स्वार्थानुमान (अपने लिए अनुमान) वैसा (शब्दात्मक) नहीं — (तो भी) वह भीतर शब्दों से (ही) स्थित नहीं; (क्योंकि) 'यह यहाँ अग्नि है' अथवा 'धूम' — (ऐसा शब्द-निश्चय) दर्शन के अभाव में (कुछ भी) नहीं दिखा सकता।