The Vision of Śiva· 5.54 / 110

The Vision of Śiva5.54

5.54
तत्सामस्त्यस्याग्रहणाददृष्टे धर्मिता कुतः । दृष्टश्चेत् सर्वघटवत्तदङ्गस्याग्निदर्शनम् ॥५४॥
tatsāmastyasyāgrahaṇādadṛṣṭe dharmitā kutaḥ | dṛṣṭaścet sarvaghaṭavattadaṅgasyāgnidarśanam
— उसकी समस्तता (पूर्णता) के ; — अग्रहण के कारण ; — अदृष्ट (पूर्ण) में ; — धर्मिता ; — कहाँ से ; — अधिकरण दृष्ट है (यदि) ; — समस्त घट (के दर्शन) के समान ; — उसके (दृष्ट) अंश का ; — अग्नि-दर्शन

उसकी समस्तता (पूर्णता) के अग्रहण के कारण, अदृष्ट (पूर्ण पर्वत) में धर्मिता कहाँ से? और यदि (कहो कि) अधिकरण दृष्ट है — तो समस्त घट (के तथाकथित दर्शन) के समान, उसके (दृष्ट) अंश का ही अग्नि-दर्शन (होगा, शेष का अनुमान विफल)।