तत्सामस्त्यस्याग्रहणाददृष्टे धर्मिता कुतः ।
दृष्टश्चेत् सर्वघटवत्तदङ्गस्याग्निदर्शनम् ॥५४॥
tatsāmastyasyāgrahaṇādadṛṣṭe dharmitā kutaḥ |
dṛṣṭaścet sarvaghaṭavattadaṅgasyāgnidarśanam
उसकी समस्तता (पूर्णता) के अग्रहण के कारण, अदृष्ट (पूर्ण पर्वत) में धर्मिता कहाँ से? और यदि (कहो कि) अधिकरण दृष्ट है — तो समस्त घट (के तथाकथित दर्शन) के समान, उसके (दृष्ट) अंश का ही अग्नि-दर्शन (होगा, शेष का अनुमान विफल)।