कुत्र तेऽन्यत्र दृष्टत्वात्तद्दृष्टेरग्निदृष्टता ।
अत्रेति धर्मिता कस्य पर्वतादौ समस्तके ॥५३॥
kutra te'nyatra dṛṣṭatvāttaddṛṣṭeragnidṛṣṭatā |
atreti dharmitā kasya parvatādau samastake
तुम्हारे (मत में अग्नि) कहाँ है? अन्यत्र (अग्नि-सहित धूम) देखे जाने के कारण, उस (धूम) के दर्शन से 'यहाँ' अग्नि-दर्शन (मान लेते हो); किन्तु (अग्नि की) धर्मिता (अधिकरणता) किसकी — समस्त रूप में लिए गए पर्वत आदि की (जो स्वयं समग्र रूप में ग्रहीत नहीं)?