The Vision of Śiva· 5.52 / 110

The Vision of Śiva5.52

5.52
सन्निधानादथाग्नेश्च चुल्ल्यादेः सन्निधिर्न किम् । धूमेन जन्यते ज्ञानं वह्निरत्रेति ते यदि ॥५२॥
sannidhānādathāgneśca cullyādeḥ sannidhirna kim | dhūmena janyate jñānaṃ vahniratreti te yadi
— सन्निधान (समीपता) से ; — अथवा ; — अग्नि की ; — और ; — चूल्हे आदि की ; — समीपता ; — क्यों न (अनुमेय) ; — धूम से ; — उत्पन्न होता है ; — ज्ञान ; — 'यहाँ अग्नि' ; — ऐसा ; — यदि तुम्हारे (मत में)

अथवा यदि (कहो कि अग्नि के) सन्निधान (समीपता) से (धूम होता है) — तो चूल्हे आदि की समीपता क्यों (अनुमेय) न हो? यदि तुम्हारे (मत में) 'यहाँ अग्नि है' यह ज्ञान धूम से उत्पन्न होता है (तो वही अनिश्चय उसमें भी लगता है)।