सन्निधानादथाग्नेश्च चुल्ल्यादेः सन्निधिर्न किम् ।
धूमेन जन्यते ज्ञानं वह्निरत्रेति ते यदि ॥५२॥
sannidhānādathāgneśca cullyādeḥ sannidhirna kim |
dhūmena janyate jñānaṃ vahniratreti te yadi
अथवा यदि (कहो कि अग्नि के) सन्निधान (समीपता) से (धूम होता है) — तो चूल्हे आदि की समीपता क्यों (अनुमेय) न हो? यदि तुम्हारे (मत में) 'यहाँ अग्नि है' यह ज्ञान धूम से उत्पन्न होता है (तो वही अनिश्चय उसमें भी लगता है)।