The Vision of Śiva· 5.51 / 110

The Vision of Śiva5.51

5.51
नचापि वह्निर्जनकः काष्ठेष्वेव हि दर्शनात् । अत एव यत्र वह्निर्भास्वान्नो धूमिताऽत्र तु ॥५१॥
nacāpi vahnirjanakaḥ kāṣṭheṣveva hi darśanāt | ata eva yatra vahnirbhāsvānno dhūmitā'tra tu
— और न ही ; — अग्नि ; — जनक ; — केवल (गीली) काष्ठ आदि में ही ; — दर्शन के कारण ; — इसी कारण ; — जहाँ ; — अग्नि ; — भास्वान् (देदीप्यमान) ; — नहीं ; — धूमिता ; — किन्तु यहाँ

और न ही अग्नि (अकेली धूम की) जनक (है), क्योंकि (धूम) केवल (गीली) काष्ठ आदि में ही (उत्पन्न होता) दीखता है; और इसी कारण जहाँ अग्नि भास्वान् (देदीप्यमान) है, वहाँ तो धूमिता (धूम का उठना) ही नहीं (अतः व्याप्ति टूट जाती है)।