नचापि वह्निर्जनकः काष्ठेष्वेव हि दर्शनात् ।
अत एव यत्र वह्निर्भास्वान्नो धूमिताऽत्र तु ॥५१॥
nacāpi vahnirjanakaḥ kāṣṭheṣveva hi darśanāt |
ata eva yatra vahnirbhāsvānno dhūmitā'tra tu
और न ही अग्नि (अकेली धूम की) जनक (है), क्योंकि (धूम) केवल (गीली) काष्ठ आदि में ही (उत्पन्न होता) दीखता है; और इसी कारण जहाँ अग्नि भास्वान् (देदीप्यमान) है, वहाँ तो धूमिता (धूम का उठना) ही नहीं (अतः व्याप्ति टूट जाती है)।