The Vision of Śiva· 5.49 / 110

The Vision of Śiva5.49

5.49
तद्बुध्नावयवैर्वाथ तेऽपि यान्त्यूर्ध्वतां क्षणात् । बुध्नस्तैर्नच सम्बद्धः कदाचिच्चक्षुषो भवेत् ॥४९॥
tadbudhnāvayavairvātha te'pi yāntyūrdhvatāṃ kṣaṇāt | budhnastairnaca sambaddhaḥ kadāciccakṣuṣo bhavet
— उस (धूम के) बुध्न (मूल) के अवयवों से ; — अथवा ; — वे भी ; — जाते हैं ; — ऊपर की ओर ; — क्षण-भर में ; — बुध्न ; — उनके साथ ; — और नहीं सम्बद्ध ; — कभी ; — चक्षु के लिए ; — हो सके

अथवा (यदि कहो कि अग्नि का अनुमान) उस धूम के बुध्न (मूल) के अवयवों से (होता है) — तो वे भी क्षण-भर में ऊपर की ओर चले जाते हैं; और बुध्न (जहाँ अग्नि है) उनके साथ चक्षु के लिए कभी सम्बद्ध नहीं हो सकता।