तत्राकाशे स्थितो धूमो न वह्नेः कणमात्रकम् ।
धूमेन व्यापितो देशो भवेदग्निमयोऽखिलः ॥४८॥
tatrākāśe sthito dhūmo na vahneḥ kaṇamātrakam |
dhūmena vyāpito deśo bhavedagnimayo'khilaḥ
वहाँ आकाश में स्थित धूम अग्नि का कण-मात्र भी नहीं; (अन्यथा) धूम से व्याप्त समस्त देश अग्निमय हो जाता (जो नहीं होता)।