The Vision of Śiva· 5.48 / 110

The Vision of Śiva5.48

5.48
तत्राकाशे स्थितो धूमो न वह्नेः कणमात्रकम् । धूमेन व्यापितो देशो भवेदग्निमयोऽखिलः ॥४८॥
tatrākāśe sthito dhūmo na vahneḥ kaṇamātrakam | dhūmena vyāpito deśo bhavedagnimayo'khilaḥ
— वहाँ ; — आकाश में ; — स्थित ; — धूम ; — नहीं ; — अग्नि का ; — कण-मात्र ; — धूम से ; — व्याप्त ; — देश ; — हो जाता ; — अग्निमय ; — समस्त

वहाँ आकाश में स्थित धूम अग्नि का कण-मात्र भी नहीं; (अन्यथा) धूम से व्याप्त समस्त देश अग्निमय हो जाता (जो नहीं होता)।