The Vision of Śiva· 5.47 / 110

The Vision of Śiva5.47

5.47
अत्रापि क्वापि वास्तीति कल्पना कल्पनैव हि । यत्र यत्र भवेद्धूमस्तत्राग्निरित्यनिश्चयात् ॥४७॥
atrāpi kvāpi vāstīti kalpanā kalpanaiva hi | yatra yatra bhaveddhūmastatrāgnirityaniścayāt
— यहाँ अथवा ; — कहीं और ; — है ; — ऐसी ; — कल्पना ; — केवल कल्पना ही ; — जहाँ-जहाँ ; — धूम हो ; — वहाँ अग्नि ; — ऐसा ; — अनिश्चय के कारण

'यहाँ अथवा कहीं और (अग्नि) है' — ऐसी कल्पना केवल कल्पना ही है, क्योंकि 'जहाँ-जहाँ धूम, वहाँ अग्नि' — यह (नियम किसी निश्चित अनुप्रयोग में) अनिश्चित है।