The Vision of Śiva· 5.45 / 110

The Vision of Śiva5.45

5.45
धूमात्तत्र गृहीतं किं सामान्यं नैव गृह्यते । अग्राह्यत्वात्तस्य तदा विशेषे दूरतैव ते ॥४५॥
dhūmāttatra gṛhītaṃ kiṃ sāmānyaṃ naiva gṛhyate | agrāhyatvāttasya tadā viśeṣe dūrataiva te
— धूम से ; — वहाँ ; — क्या ग्रहीत हुआ ; — सामान्य (धूमत्व) ; — ग्रहीत होता ही नहीं ; — अग्राह्य होने के कारण ; — उसके ; — तब ; — विशेष (अग्नि) के विषय में ; — दूरता ही (अनिश्चय) ; — तुम्हें

धूम से वहाँ क्या ग्रहीत हुआ? सामान्य (धूमत्व) तो ग्रहीत होता ही नहीं, क्योंकि वह अग्राह्य है; और तब विशेष (अग्नि) के विषय में तो तुम्हें दूरता (दूरी, अनिश्चय) ही (है)।