धूमात्तत्र गृहीतं किं सामान्यं नैव गृह्यते ।
अग्राह्यत्वात्तस्य तदा विशेषे दूरतैव ते ॥४५॥
dhūmāttatra gṛhītaṃ kiṃ sāmānyaṃ naiva gṛhyate |
agrāhyatvāttasya tadā viśeṣe dūrataiva te
धूम से वहाँ क्या ग्रहीत हुआ? सामान्य (धूमत्व) तो ग्रहीत होता ही नहीं, क्योंकि वह अग्राह्य है; और तब विशेष (अग्नि) के विषय में तो तुम्हें दूरता (दूरी, अनिश्चय) ही (है)।