The Vision of Śiva· 5.44 / 110

The Vision of Śiva5.44

5.44
तत्स्थान एव तज्ज्ञाना संविदेषा विमृश्यताम् । नचाप्यस्त्यनुमानेन परेषां ग्रहणं क्वचित् ॥४४॥
tatsthāna eva tajjñānā saṃvideṣā vimṛśyatām | nacāpyastyanumānena pareṣāṃ grahaṇaṃ kvacit
— उसी स्थान पर ; — उस विषय को जानती हुई ; — संवित् (चेतना) ; — यह ; — विमर्श करो ; — और न ही ; — है ; — अनुमान से ; — अन्य (अदृष्ट) वस्तुओं का ; — ग्रहण ; — कहीं

इसका विमर्श करो: यह संवित् (चेतना ही है) जो उस विषय को ठीक उसी स्थान पर (जहाँ वह है) जानती है; और न ही अनुमान से अन्य (अदृष्ट) वस्तुओं का ग्रहण कहीं होता है (इस संवित् के अतिरिक्त)।