The Vision of Śiva· 5.41 / 110

The Vision of Śiva5.41

5.41
बाह्यावयवतद्योगात्तदन्तरवियोगतः । पटो गृहीतः सकल इति न स्यात् प्रमा क्वचित् ॥४१॥
bāhyāvayavatadyogāttadantaraviyogataḥ | paṭo gṛhītaḥ sakala iti na syāt pramā kvacit
— बाह्य अवयवों के साथ उस (चक्षु के) योग से ; — भीतरी (अवयवों) से वियोग के कारण ; — पट ; — ग्रहीत ; — सम्पूर्ण ; — ऐसी ; — न होगी ; — प्रमा (यथार्थ ज्ञान) ; — कहीं

बाह्य अवयवों के साथ उस (चक्षु के) योग से, और भीतरी (अवयवों) से वियोग के कारण, 'पट सम्पूर्ण ग्रहीत हुआ' — ऐसी प्रमा (यथार्थ ज्ञान) कहीं न होगी (केवल चित् ही समग्र को ग्रहण करती है)।