व्यापका व्यपदिश्यन्ते स्वकार्यव्यापनादथ ।
यदि ते न स्वयंग्राह्या गृह्यन्ते नैव चक्षुषा ॥४०॥
vyāpakā vyapadiśyante svakāryavyāpanādatha |
yadi te na svayaṃgrāhyā gṛhyante naiva cakṣuṣā
(वस्तुएँ) अपने कार्यों के व्यापन (व्याप्ति) से व्यापक कही जाती हैं; अब यदि वे स्वयं (अपने चित्-स्वरूप से) ग्राह्य न हों, तो चक्षु से तो (वे) कभी ग्रहीत नहीं होतीं (क्योंकि चक्षु तो ऊपरी तल तक ही पहुँचती है)।