इच्छावत्त्वमनेनैव न्यायेनास्य निजां क्रियाम् ।
अनिच्छुर्न करोत्येवमत एवास्ति निर्वृतिः ॥३७॥
icchāvattvamanenaiva nyāyenāsya nijāṃ kriyām |
anicchurna karotyevamata evāsti nirvṛtiḥ
इसी न्याय से इसका (घट का) इच्छावत्त्व (सिद्ध है, क्योंकि वह) अपनी क्रिया (करता है); इच्छारहित कुछ नहीं करता। इसी कारण (उसमें) निर्वृति (आनन्द) भी है।