अन्धादेरन्यदृष्ट्यात्र घटः किं प्रथते न चेत् ।
शिवत्वस्य तथा व्यक्तेर्घटस्येच्छा तथास्ति वा ॥३६॥
andhāderanyadṛṣṭyātra ghaṭaḥ kiṃ prathate na cet |
śivatvasya tathā vyakterghaṭasyecchā tathāsti vā
(आक्षेप:) क्या यहाँ अन्ध आदि (के साथ खड़े) अन्य की दृष्टि से घट प्रकाशित नहीं होता? (उत्तर:) उसी प्रकार, शिवत्व की अभिव्यक्ति से घट की भी इच्छा वैसी ही है (अर्थात् घट की अपनी इच्छा/चित् है)।