The Vision of Śiva· 5.36 / 110

The Vision of Śiva5.36

5.36
अन्धादेरन्यदृष्ट्यात्र घटः किं प्रथते न चेत् । शिवत्वस्य तथा व्यक्तेर्घटस्येच्छा तथास्ति वा ॥३६॥
andhāderanyadṛṣṭyātra ghaṭaḥ kiṃ prathate na cet | śivatvasya tathā vyakterghaṭasyecchā tathāsti vā
— अन्ध आदि (के साथ खड़े) ; — अन्य की दृष्टि से ; — यहाँ ; — घट ; — क्या प्रकाशित नहीं होता ; — यदि (आक्षेप) ; — शिवत्व की ; — उसी प्रकार ; — अभिव्यक्ति से ; — घट की ; — इच्छा ; — उसी प्रकार है भी

(आक्षेप:) क्या यहाँ अन्ध आदि (के साथ खड़े) अन्य की दृष्टि से घट प्रकाशित नहीं होता? (उत्तर:) उसी प्रकार, शिवत्व की अभिव्यक्ति से घट की भी इच्छा वैसी ही है (अर्थात् घट की अपनी इच्छा/चित् है)।