तदैक्यात्तच्चक्षुषैव प्रक्रिया चेत् कथं स्थिता ।
तथा शिवस्य सर्गाद्वा प्रक्रियायास्तथात्मनः ॥३५॥
tadaikyāttaccakṣuṣaiva prakriyā cet kathaṃ sthitā |
tathā śivasya sargādvā prakriyāyāstathātmanaḥ
यदि (कहो कि) उस (आत्मा के साथ) एकता के कारण उसी चक्षु से ही प्रक्रिया (ज्ञान-व्यापार होती है) — तो वह (एकता) कैसे स्थित है? उसी प्रकार (वह प्रक्रिया) शिव के सर्ग (सृष्टि) से (होती है), जो प्रक्रिया और (ज्ञाता का) आत्मा (दोनों) ही है।