The Vision of Śiva· 5.34 / 110

The Vision of Śiva5.34

5.34
प्रतिबिम्बेष्वसत्यत्वादमूर्तेष्वेष्वगोचरात् । तस्माद्घटः स्वमात्मानमवगच्छन्नवस्थितः ॥३४॥
pratibimbeṣvasatyatvādamūrteṣveṣvagocarāt | tasmādghaṭaḥ svamātmānamavagacchannavasthitaḥ
— प्रतिबिम्बों में ; — असत्य होने के कारण ; — अमूर्त (आत्मा) में ; — इनमें ; — गोचर न होने के कारण ; — इसलिए ; — घट ; — अपने आत्मा को ; — जानता हुआ ; — अवस्थित

(संगति नहीं,) क्योंकि प्रतिबिम्ब असत्य होते हैं, और क्योंकि अमूर्त (आत्मा) में ये (मूर्त भाव) गोचर (विषय) नहीं। इसलिए घट अपने ही आत्मा को जानता हुआ अवस्थित है (— वह स्वयं चित् का आश्रय है)।