The Vision of Śiva· 5.33 / 110

The Vision of Śiva5.33

5.33
चक्षूरश्मिगमत्वं चेत् स प्रत्यक्षोऽर्करश्मिवत् । भावानां प्रतिबिम्बत्व आत्मनोऽपि न युक्तता ॥३३॥
cakṣūraśmigamatvaṃ cet sa pratyakṣo'rkaraśmivat | bhāvānāṃ pratibimbatva ātmano'pi na yuktatā
— चक्षु-रश्मि का गमन ; — यदि ; — वह ; — प्रत्यक्ष ; — सूर्य-रश्मि के समान ; — भावों के ; — प्रतिबिम्ब (रूप) होने पर ; — आत्मा की भी ; — नहीं युक्तता

यदि (कहो कि) चक्षु-रश्मि का गमन (होता है) — तो वह सूर्य-रश्मि के समान प्रत्यक्ष (दीखती, जो नहीं)। और यदि भाव (आत्मा में) प्रतिबिम्ब (रूप) हों, तो आत्मा की भी युक्तता (संगति) नहीं।