तदात्मन्यपरोक्षत्वे भवेदाप्तवचः स्फुटम् ।
ये विकल्पाः शक्तिगतास्तेऽप्यायान्ति मनः प्रति ॥३२॥
tadātmanyaparokṣatve bhavedāptavacaḥ sphuṭam |
ye vikalpāḥ śaktigatāste'pyāyānti manaḥ prati
(किन्तु) यदि वह (अर्थ) आत्मा में (पहले से) अपरोक्ष है, तो (अर्पण) स्पष्टतः (केवल) आप्त-वचन (सुनी-सुनाई बात) मात्र होगा; और जो विकल्प शक्ति-गत हैं, वे भी मन की ओर आते हैं (जिसके लिए फिर एकता अपेक्षित है)।