The Vision of Śiva· 5.32 / 110

The Vision of Śiva5.32

5.32
तदात्मन्यपरोक्षत्वे भवेदाप्तवचः स्फुटम् । ये विकल्पाः शक्तिगतास्तेऽप्यायान्ति मनः प्रति ॥३२॥
tadātmanyaparokṣatve bhavedāptavacaḥ sphuṭam | ye vikalpāḥ śaktigatāste'pyāyānti manaḥ prati
— वह (अर्थ) ; — आत्मा में ; — अपरोक्ष होने पर ; — होगा ; — आप्त-वचन (सुनी बात) ; — स्पष्टतः ; — जो विकल्प ; — शक्ति-गत ; — वे भी ; — आते हैं ; — मन की ओर

(किन्तु) यदि वह (अर्थ) आत्मा में (पहले से) अपरोक्ष है, तो (अर्पण) स्पष्टतः (केवल) आप्त-वचन (सुनी-सुनाई बात) मात्र होगा; और जो विकल्प शक्ति-गत हैं, वे भी मन की ओर आते हैं (जिसके लिए फिर एकता अपेक्षित है)।