विभुत्वेनेन्द्रियाणां ते किं वृथैव शरीरता ।
चक्षुषा चेदर्पितं मे मनसात्मन्यथार्प्यते ॥३१॥
vibhutvenendriyāṇāṃ te kiṃ vṛthaiva śarīratā |
cakṣuṣā cedarpitaṃ me manasātmanyathārpyate
आत्मा की व्यापकता से इन्द्रियों की शरीरता (देह-सामग्री) तुम्हारे (मत में) क्या व्यर्थ ही (नहीं)? यदि (कहो कि) चक्षु से मुझे अर्पित किया जाता है, और (फिर) मन से आत्मा में अर्पित किया जाता है (— तो यह कठिनाई बढ़ाता ही है)।