नानिर्वृतौ प्रवर्तेत स्फुटे ज्ञानक्रिये स्थिते ।
कर्मप्रभवनत्वात्तत्प्रभुत्वमवधार्यते ॥३८॥
nānirvṛtau pravarteta sphuṭe jñānakriye sthite |
karmaprabhavanatvāttatprabhutvamavadhāryate
निर्वृति के बिना कोई (कर्म में) प्रवृत्त नहीं होता; (अतः) ज्ञान-क्रिया के स्पष्ट रूप से स्थित होने पर, और (प्रत्येक के) कर्म-प्रभव (कर्म-उत्पादक) होने के कारण, उसका (शिव-) प्रभुत्व निश्चित किया जाता है।