तथाकारगुणत्वान्न द्रव्याच्च चलनं पृथक् ।
शक्तेर्नचापि तज्ज्ञानं येन सा तन्निवेदयेत् ॥२९॥
tathākāraguṇatvānna dravyācca calanaṃ pṛthak |
śakternacāpi tajjñānaṃ yena sā tannivedayet
(दृष्टि-शक्ति के उस मूर्त) आकार का गुण होने के कारण, द्रव्य से पृथक् (उसका) चलन नहीं (हो सकता); और न ही शक्ति को उस (विषय) का ज्ञान (होता) है, जिससे वह उसे (आत्मा को) निवेदित करे।