The Vision of Śiva· 5.29 / 110

The Vision of Śiva5.29

5.29
तथाकारगुणत्वान्न द्रव्याच्च चलनं पृथक् । शक्तेर्नचापि तज्ज्ञानं येन सा तन्निवेदयेत् ॥२९॥
tathākāraguṇatvānna dravyācca calanaṃ pṛthak | śakternacāpi tajjñānaṃ yena sā tannivedayet
— (उस मूर्त) आकार का गुण होने के कारण ; — नहीं ; — द्रव्य से ; — और ; — चलन ; — पृथक् ; — शक्ति को ; — न ही ; — उस (विषय) का ज्ञान ; — जिससे ; — वह ; — उसे निवेदित करे

(दृष्टि-शक्ति के उस मूर्त) आकार का गुण होने के कारण, द्रव्य से पृथक् (उसका) चलन नहीं (हो सकता); और न ही शक्ति को उस (विषय) का ज्ञान (होता) है, जिससे वह उसे (आत्मा को) निवेदित करे।