The Vision of Śiva· 5.28 / 110

The Vision of Śiva5.28

5.28
शक्तिर्घटेऽत्र किं कुर्यागृहित्वान्तरथाविशेत् । बुध्नोदरादिकं तत्तु गृहीत्वा नच युज्यते ॥२८॥
śaktirghaṭe'tra kiṃ kuryāgṛhitvāntarathāviśet | budhnodarādikaṃ tattu gṛhītvā naca yujyate
— शक्ति ; — घट में ; — यहाँ ; — क्या करेगी ; — ग्रहण करके ; — तब भीतर प्रवेश करेगी ; — बुध्न (तल), उदर आदि ; — किन्तु उसका ; — ग्रहण करना ; — और सम्भव नहीं

शक्ति यहाँ घट में क्या करेगी? (क्या उसे) ग्रहण करके भीतर प्रवेश करेगी? किन्तु उसका बुध्न (तल), उदर आदि को ग्रहण करना सम्भव ही नहीं (क्योंकि अमूर्त मूर्त को नहीं पकड़ सकता)।