शक्तिर्घटेऽत्र किं कुर्यागृहित्वान्तरथाविशेत् ।
बुध्नोदरादिकं तत्तु गृहीत्वा नच युज्यते ॥२८॥
śaktirghaṭe'tra kiṃ kuryāgṛhitvāntarathāviśet |
budhnodarādikaṃ tattu gṛhītvā naca yujyate
शक्ति यहाँ घट में क्या करेगी? (क्या उसे) ग्रहण करके भीतर प्रवेश करेगी? किन्तु उसका बुध्न (तल), उदर आदि को ग्रहण करना सम्भव ही नहीं (क्योंकि अमूर्त मूर्त को नहीं पकड़ सकता)।