The Vision of Śiva· 5.27 / 110

The Vision of Śiva5.27

5.27
प्राक्शक्तेरथ सामर्थ्यं शक्तेः शक्तत्वमापतेत् । मनसो नच बाह्येऽस्ति तस्यापि प्रसरः क्वचित् ॥२७॥
prākśakteratha sāmarthyaṃ śakteḥ śaktatvamāpatet | manaso naca bāhye'sti tasyāpi prasaraḥ kvacit
— पूर्व शक्ति का ; — तब ; — सामर्थ्य ; — शक्ति का ; — शक्तत्व ; — आ पड़ेगा ; — मन का ; — और नहीं ; — बाह्य में ; — है ; — उसका भी ; — प्रसार ; — कहीं

तब पूर्व शक्ति का सामर्थ्य (अपेक्षित होगा), और (उस) शक्ति का (फिर) शक्तत्व आ पड़ेगा (— यों अनवस्था)। और मन भी बाह्य (विषय) में स्थित नहीं; न ही उसका कहीं (विषय तक) प्रसार है।