प्राक्शक्तेरथ सामर्थ्यं शक्तेः शक्तत्वमापतेत् ।
मनसो नच बाह्येऽस्ति तस्यापि प्रसरः क्वचित् ॥२७॥
prākśakteratha sāmarthyaṃ śakteḥ śaktatvamāpatet |
manaso naca bāhye'sti tasyāpi prasaraḥ kvacit
तब पूर्व शक्ति का सामर्थ्य (अपेक्षित होगा), और (उस) शक्ति का (फिर) शक्तत्व आ पड़ेगा (— यों अनवस्था)। और मन भी बाह्य (विषय) में स्थित नहीं; न ही उसका कहीं (विषय तक) प्रसार है।