पुरा शक्तेरानयने चक्षुः शक्तं न वेति वा ।
तस्यापि शक्तेः कल्प्यत्वे भवत्यानन्त्यसंगमः ॥२६॥
purā śakterānayane cakṣuḥ śaktaṃ na veti vā |
tasyāpi śakteḥ kalpyatve bhavatyānantyasaṃgamaḥ
और (पूछो:) पहले शक्ति को (विषय तक) ले जाने में चक्षु शक्त (समर्थ) है या नहीं? यदि उसके लिए भी (एक और) शक्ति कल्पनीय हो, तो अनन्त्य (अनवस्था) का संगम (आ पड़ता) है।