आत्मनो व्यापकत्वेन शरीरे व्यर्थता भवेत् ।
जडत्वादथवा शक्तस्तच्छक्त्या तद्घटो घवेत् ॥२५॥
ātmano vyāpakatvena śarīre vyarthatā bhavet |
jaḍatvādathavā śaktastacchaktyā tadghaṭo ghavet
आत्मा के व्यापक होने से शरीर (की इन्द्रिय-सामग्री) व्यर्थ हो जाएगी; अथवा, (चक्षु के) जड़ होने के कारण, (वह तभी जान सके जब) शक्त (चित् से सशक्त) हो — और उस शक्ति से घट भी (चेतन) हो जाएगा।