The Vision of Śiva· 5.25 / 110

The Vision of Śiva5.25

5.25
आत्मनो व्यापकत्वेन शरीरे व्यर्थता भवेत् । जडत्वादथवा शक्तस्तच्छक्त्या तद्घटो घवेत् ॥२५॥
ātmano vyāpakatvena śarīre vyarthatā bhavet | jaḍatvādathavā śaktastacchaktyā tadghaṭo ghavet
— आत्मा के ; — व्यापक होने से ; — शरीर (की सामग्री) ; — व्यर्थता ; — होगी ; — (चक्षु के) जड़ होने के कारण ; — अथवा ; — शक्त (सशक्त) ; — उस शक्ति से ; — इसलिए ; — घट ; — हो जाएगा (चेतन)

आत्मा के व्यापक होने से शरीर (की इन्द्रिय-सामग्री) व्यर्थ हो जाएगी; अथवा, (चक्षु के) जड़ होने के कारण, (वह तभी जान सके जब) शक्त (चित् से सशक्त) हो — और उस शक्ति से घट भी (चेतन) हो जाएगा।