The Vision of Śiva· 5.23 / 110

The Vision of Śiva5.23

5.23
नान्यथा ग्रहणं तेषां देवदत्तेन चेद्भवेत् । देवदत्तोऽत्र किं कुर्याच्चक्षुश्चेत् प्रेरयेद्घटे ॥२३॥
nānyathā grahaṇaṃ teṣāṃ devadattena cedbhavet | devadatto'tra kiṃ kuryāccakṣuścet prerayedghaṭe
— अन्यथा नहीं ; — ग्रहण ; — उनका ; — देवदत्त के द्वारा ; — यदि ; — हो ; — देवदत्त ; — यहाँ ; — क्या करेगा ; — चक्षु ; — यदि ; — प्रेरित करे ; — घट की ओर

और उनका ग्रहण अन्यथा (चित् के बिना) नहीं हो सकता। यदि (कहो कि) वह देवदत्त के द्वारा होता है — तो देवदत्त यहाँ क्या करेगा? यदि (कहो कि) वह घट की ओर चक्षु को प्रेरित करता है (— तो आगे का दोष देखो)।