नान्यथा ग्रहणं तेषां देवदत्तेन चेद्भवेत् ।
देवदत्तोऽत्र किं कुर्याच्चक्षुश्चेत् प्रेरयेद्घटे ॥२३॥
nānyathā grahaṇaṃ teṣāṃ devadattena cedbhavet |
devadatto'tra kiṃ kuryāccakṣuścet prerayedghaṭe
और उनका ग्रहण अन्यथा (चित् के बिना) नहीं हो सकता। यदि (कहो कि) वह देवदत्त के द्वारा होता है — तो देवदत्त यहाँ क्या करेगा? यदि (कहो कि) वह घट की ओर चक्षु को प्रेरित करता है (— तो आगे का दोष देखो)।