इतश्च तेऽपि चिद्वन्तः स्वात्मनि ज्ञानयोगतः ।
स्वयमेव न चेज्ज्ञानमात्मन्येषां प्रजायते ॥२२॥
itaśca te'pi cidvantaḥ svātmani jñānayogataḥ |
svayameva na cejjñānamātmanyeṣāṃ prajāyate
और इससे भी (सिद्ध है कि) वे (भाव) भी चित्-वान् हैं, अपने आत्मा में ज्ञान के योग के कारण; (क्योंकि) यदि इनके आत्मा में ज्ञान स्वयं ही न उत्पन्न होता (तो वे ज्ञान के विषय ही न बन सकते)।