The Vision of Śiva· 5.22 / 110

The Vision of Śiva5.22

5.22
इतश्च तेऽपि चिद्वन्तः स्वात्मनि ज्ञानयोगतः । स्वयमेव न चेज्ज्ञानमात्मन्येषां प्रजायते ॥२२॥
itaśca te'pi cidvantaḥ svātmani jñānayogataḥ | svayameva na cejjñānamātmanyeṣāṃ prajāyate
— और इससे ; — वे भी ; — चित्-वान् ; — अपने आत्मा में ; — ज्ञान के योग के कारण ; — स्वयं ही ; — यदि न ; — ज्ञान ; — आत्मा में ; — इनके ; — उत्पन्न होता

और इससे भी (सिद्ध है कि) वे (भाव) भी चित्-वान् हैं, अपने आत्मा में ज्ञान के योग के कारण; (क्योंकि) यदि इनके आत्मा में ज्ञान स्वयं ही न उत्पन्न होता (तो वे ज्ञान के विषय ही न बन सकते)।