तथा वा शिवतत्त्वस्य सम्भूतेरथवातथा ।
एकैकशोऽस्ति चैतन्यमनभिव्यक्तरूपकम् ॥२१॥
tathā vā śivatattvasya sambhūterathavātathā |
ekaikaśo'sti caitanyamanabhivyaktarūpakam
अथवा इस प्रकार — शिव-तत्त्व की सम्भूति (स्वतः-उत्पत्ति) से, चाहे वैसे या अन्यथा — प्रत्येक एक-एक (वस्तु) में चैतन्य है, (किन्तु) अनभिव्यक्त रूप में।