The Vision of Śiva· 5.19 / 110

The Vision of Śiva5.19

5.19
प्राणाद्युन्मेषविरहादभिव्यक्तं नु कस्य तत् । सर्वचैतन्यवादे तु चार्वाकोऽत्र न सिद्ध्यति ॥१९॥
prāṇādyunmeṣavirahādabhivyaktaṃ nu kasya tat | sarvacaitanyavāde tu cārvāko'tra na siddhyati
— प्राण आदि के उन्मेष के विरह से ; — अभिव्यक्त ; — निश्चय ही ; — किसको ; — वह (अचैतन्य) ; — सर्व-चैतन्य-वाद में ; — किन्तु ; — चार्वाक ; — यहाँ ; — सिद्ध नहीं होता

प्राण आदि के उन्मेष के विरह (अभाव) से — वह (अचैतन्य) किसको अभिव्यक्त (हुआ, क्योंकि अभिव्यक्ति स्वयं चेतन है)? किन्तु सर्व-चैतन्य-वाद में चार्वाक (भौतिकवादी) यहाँ सिद्ध नहीं होता (कि चैतन्य जड़ का ही उत्पाद है)।