प्राणाद्युन्मेषविरहादभिव्यक्तं नु कस्य तत् ।
सर्वचैतन्यवादे तु चार्वाकोऽत्र न सिद्ध्यति ॥१९॥
prāṇādyunmeṣavirahādabhivyaktaṃ nu kasya tat |
sarvacaitanyavāde tu cārvāko'tra na siddhyati
प्राण आदि के उन्मेष के विरह (अभाव) से — वह (अचैतन्य) किसको अभिव्यक्त (हुआ, क्योंकि अभिव्यक्ति स्वयं चेतन है)? किन्तु सर्व-चैतन्य-वाद में चार्वाक (भौतिकवादी) यहाँ सिद्ध नहीं होता (कि चैतन्य जड़ का ही उत्पाद है)।